ध्यान || Dhyan

जीवन के अधिकांश कार्यों के साथ सोचने – विचारने का बहुत अधिक सम्बन्ध रहता है | इन सबसे सफलता प्राप्त करने के लिए प्रत्याहार और धारण की आवश्यकता है | चोर भी यदि इनका प्रयोग करें तो अच्छी चोरी कर सकता है | केवल योगियों को ही नहीं भोगियों को भी मनोनिग्रह की आवश्यकता है | अपने – अपने ढंग से भी वे करते है , क्योंकि इस साधना के बिना किसी भी कार्य में कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती |



प्रत्याहार और धारण से मन जब लोच पर आ जाता है तब ध्यान और समाधि की ओर आसानी से कदम बढ़ने लगते है | राजयोग की सातवी सीढीं ध्यान है | नियत विषय में अधिकाधिक मनोयोग के साथ जुट जाना , तन्मय हो जाना , सारी सुध – बुध भुलाकर उसी में निमग्र हो जाना ध्यान है |



संसार में जिन महापुरुषों ने जो महान कार्य किये है , वे एकाग्र द्वारा ही हो सकता है | उन्होंने सदा अपने लक्ष्य का ध्यान रखा और केवल लक्ष्य का ध्यान रखा | तभी वे विघ्र – बाधाओं से टकराते हुए अपने मंजिल – मकसद तक बढ़ते  चले गये | डाल – डाल पर उड़ने वाले और पात – पात पर डोलने वाले लोगों से यह आशा नहीं की जा सकती कि वे कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त करके दिखा सकेंगे | छोटे आतिशी शीशे के द्वारा सूर्य की किरणें एक स्थान पर एकत्रित करने से अग्री उत्पन्न हो जाती है , किन्तु वैसे उतने घेरे की बिखरी हुई इधर – उधर फैली रहे तो उनसे कुछ अधिक कार्य नहीं हो सकता किन्तु यदि वे एकत्रित हो जाये तो आतिशी शीशे की तरह अग्री उत्पन्न कर सकती है | अधिक काम कर सकता है | सारा मनोयोग लगाकर किये हुए कार्य तो सफल होते है साथ में अपनी योग्यता भी बढ़ती है |



इन्हीं सब बातों का विचार करते हुए अध्यात्म शिक्षा के अंतर्गत अनेक प्रकार के ध्यानो का विधान किया गया है | ध्यान से रहित कोई भी साधना नहीं है , सीधी साधनाओ में किसी न किसी प्रकार ध्यान करना पड़ता है | साकार – निराकार सभी उपासनाये ध्यान से परिपूर्ण हैं | राम , कृष्ण , शिव , हनुमान , दुर्गा , गणेश आदि देवताओं की भक्ति करते है , मनुष्य जो कुछ चाहता है , उस आकांक्षा का एक द्रश्य चित्र बनाकर उसको मानसिक चेतना के सम्मुख रखने के लिए कहा जाता है  ताकि ध्यान करते – करते तदाकार अवस्था प्राप्त होने लगे |

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