धारणा | Dharna

अंग्रेजी भाषा में मन और मैन (मनुष्य) एक ही प्रकार लिखे जाते है | मैन (Man) शब्द को आप मन भी पढ़ सकते हैं और मैन भी | इससे प्रतीत होता है की मन और मनुष्य में कुछ अन्तर नहीं | जिसका जैसा मन है , वह मनुष्य भी उसी प्रकार का होगा | महापुरुष चार्ल्स डिकिन्स का कथन है की जिस मनुष्य की जैसी आंतरिक भावनाएँ होंगी , उसकी सारी वाह्य रूपरेखा वैसी ही बन जाएगी |


महर्षि वशिष्ठ का मत है कि (मन) बीज की जाति का पोंधा उगता है और संकल्पों की जाति की परिस्थितियों पैदा होती है | गीता कहती है – “ यों चच्छ्रद्ध स एव स ” अर्थात – जो जैसी श्रद्धा रखता है वह वैसा ही हो जाता है | सचमुच विश्रासों के आधार पर ही मनुष्य अपने लिए सुख – दुःख , उन्नति – अवनति , बन्धन – मोक्ष की भूमिका तैयार करता है |






राजयोग की छठवीं सीढ़ी ‘ धारणा ’ का तात्पर्य उस प्रकार के विश्रासों को धारण करने से है , जिनके द्वारा मनोवांछित स्थिति को प्राप्त किया जाता है | भौतिक वस्तुओं कुपुत्रों को भी मिल जाती है , परन्तु आत्मिक सम्पदाओं में एक भी ऐसी नहीं है जो अनधिकारी को भी मिल सके | प्रसन्नता , निरोगता , सुख , शान्ति , संतोष , तृप्ति , आनन्द प्रभृति आत्मिक सम्पदाए हैं , जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य भौतिक वस्तुएँ खोजता रहता हैं , इन्द्रीय भोग तथा धन – सम्पदा द्वारा तृप्ति , प्रसन्नता और शान्ति को उपलब्ध करने का प्रयत्न किया जाता है , पर हाथ कुछ नहीं आती | बदले में तृष्णा , चिन्ता , व्याकुलता , अशान्ति बढ़ती जाती है | वास्तव में आत्मिक संपदाओं भौतिक वस्तुओं से खरीदी नहीं जा सकती , वह तो आत्मिक प्रयत्नों से ही प्राप्त हो सकती है | सच है ‘ मनुष्य भाग्य का गुलाम नहीं , भाग्य का निर्माता है | ’ वह आत्मिक तथा सांसारिक परिस्थितियों अपने बाहुबल से उपार्जित करता है | कोई भी दूसरी शक्ति उसे हानि - लाभ नहीं पहुँचा सकती | अपने आप ही अपने लिए वह आम , बबूल बोता है और खुद ही उनके परिणामों से हँसता – रोता है | अध्यात्म शास्त्र इस स्वयं सिधान्त को पूर्णरूप से स्वीकार करता है , इसलिए उसने साधकों को आदेश किया है कि वैसा बीज बोओ जैसा फल खाना चाहते हो , मन में उस प्रकार के संस्कारों को धारण करो जिससे मनोकामना पूरी हो सके | यही धारणा का अभिप्राय है |



मन को स्वच्छ एवं सुसंस्कृत करने की शिक्षा का उत्तरार्ध धारणा में निहित है | अच्छे , आवश्यक सामयिक एवं उपयोगी गुणों को चुन - चुन कर अपने अंदर धारण करना चाहिए | मन , वचन , कर्म से इसी दिशा में कदम आगे बढ़े | रामायण कहती है कि –


“ जेहि कर जेहि पर सत्य सनेहू | सो तेहि मिलत न कछु संदेहू ||”

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