प्राणायाम : (pranayam)

Updated: Mar 23

प्राणायाम की महत्ता – ‘प्राण’ एक स्वतंत्र तत्त्व है, जिसे जीवनी शक्ति भी कह सकते हैं| मिट्टी, पानी, हवा, आकाश, अग्नि- यह पांच जड़ तत्त्व हैं, इनकी सहायता से संसार के विभिन्न द्रश्य पदार्थों की रचना होती है, परन्तु ऐसा न समझना चाहिए कि विश्व के मूलभूत पदार्थ इतने ही हैं| चैतन्य तत्त्वों की सत्ता इनसे पृथक् है| ये भी पांच हैं- प्राणतत्त्व, बुद्धि तत्त्व, आत्मतत्त्व, ब्रह्मतत्त्व, विचार तत्त्व हैं| इस निर्जीव दुनिया में हलचल, गति, चेतना, विकास के जो भी द्रश्य दिखाई देते हैं, उनका कर्त्त्रत्त्व उपरोक्त चैतन्य पंच तत्त्वों के ऊपर निर्भर है| किसी जीव की मृत्यु हो जाती है तो कहते हैं कि इसका प्राण निकल गया|






शरीर को आत्मा के रहने योग्य बनाये रखने की क्षमता एक स्वतंत्र तत्त्व में है और उसका नाम है ‘प्राण’| इसकी ही प्रेरणा से बीज उगते हैं, पौंधे बढ़ते और हरे रहते हैं| इसे जीवनी शक्ति भी कह सकते हैं, विश्व में जितना भी जीवन दिखाई दे रहा है, वह प्राणतत्त्व के कारण ही है|


भारतीय अध्यात्म विज्ञान वेत्ताओं ने बड़े प्रयत्न , अन्वेषण और अनुभव के उपरान्त उस मार्ग को ढूँढ निकाला है , जिसके द्वारा उस विश्वव्यापी जीवन दात्री प्राण शक्ति को हम अपने अंदर प्रचुर मात्रा में भर सकते हैं और उसके प्रभाव से उत्तम स्वास्थ्य , दीर्घ जीवन , चैतन्यता , स्फूर्ति , क्रिया शक्ति , सहन करने की क्षमता , मानसिक तीक्ष्णता  आदि नाना प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त कर सकते है |



इस मार्ग का नाम है - प्राणायाम | प्राणायाम श्रास को खींचकर , उसे अंदर रोके रहने और बाहर निकालने की एक विशेष क्रिया पध्दति है | इस विधान के अनुसार प्राण को उसी प्रकार अन्दर भरा जाता है , जैसे साईकिल  के टायर में पम्प से ट्यूब में हवा भरी जाती है | यह पम्प ऐसा बना होता है की हवा को भरता तो है पर वापस नहीं खिंचता है | प्राणायाम भी इसी प्रकार होता है | साधारण श्रास – प्रश्रास क्रिया में वायु के साथ वह प्राण इसी प्रकार आता जाता है , तो वायु में से प्राण को खींचकर खासतौर से उसे शरीर में स्थापित किया जाता है | जैसे कि धर्मशाला में यात्री को व्यवस्थापुर्वक टिकाया जाता है |


प्राणायाम से शरीर की सूक्ष्म क्रिया पद्धति के उपर अद्रश्य रूप से ऐसे विज्ञान सम्मत प्रभाव पड़ते है , जिनके कारण रक्त संचार , नाड़ी संचालन , पाचन क्रिया , स्फूर्ति एवं मानसिक विकास के चिन्ह स्पष्ट रूप से द्रष्टिगोचर होते है एवं स्वस्थता , प्रसन्नता , उत्साह तथा परिश्रम की योग्यता बढ़ती है | अतः प्राणायाम आत्मोन्नति की एक महत्वपूर्ण साधना है |

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