मट्टी का उपयोग || Use of Mitti in Naturopathy

मट्टी में विष अथवा जहर को खीचने की अद्भुत  सक्ती  है | गीली मट्टी को शरीर के किसी  रोग युक्त अंग पर बाँध  दिया जाय  और फिर थोड़े  समय बाद उसे  खोला  जाय तो उस मिट्टी में  मनुष्य शरीर का विष  यानि जहर  बहुत अधिक मात्रा  में मिलेगा |






इससे अतिरिक्त पोषक  तत्व देने की भी पृथ्वी में  अद्भुत छमता  है | प्राय: सभी पदाथो में से एक प्रकार की गंधयुक्त  वाष्प निकलती  रहती है | फल  और पुष्पों  की  अपनी महक या गंध अलग होती है,  जीव  जंतुओं  के शरीरों  से भी  गंधयुक्त  वायु  निकलती है | इसी प्रकार  पृथ्वी में से भी निकलती रहती है, पृथ्वी के रासयनिक द्रव  ही  रुपान्तरण करते हुए  उपयोगी  पेड़- पोधो  का रूप  धारण  करते है | यह महत्वपूर्ण  तत्व पृथ्वी से निकलती  रहने वाली वाष्प के साथ बाहर आते  रहते है | पृथ्वी के समीप शरीर  को रखने से वह  वाष्प शरीर  को प्राप्त होती  रहती है,  जिसका  स्वास्थ  पर बड़ा अच्छा असर पड़ता है |



प्राचीन काल में  ऋषि-मुनी  भूमि खोद कर गुफा  बना लेते थे  और  उसमे रहा करते थे | इससे  उसके स्वास्थ  पर बड़ा अच्छा असर पड़ता था, मट्टी  उनके शरीर के दूषित पदाथो को खीच लेती थी,  साथ ही  भूमि से निकलने वाला वाष्प द्वारा देह  का पोषण भी होता रहता था | आसन लगाकर , निराहार  रहने के लिये गुफाओं  ही उपयोगी स्थान यानि  जगह  है | अन्य स्थानों में इतनी सरलता और सफलता  नहीं  होती |



छोटे बालक जो प्राकृति के समीप है , पृथ्वी के महत्व को जानते है , वे भूमिपर  खेलना , भूमि पर  लेटना , तकियों की अपेक्षा अधिक पसंद करते है  पशुओं को देखिये  वे अपनी थकान मिटाने  के लिए  जमीन पर लोटपोट करते  है |  और लोटपोट  से  भूमि की शक्ती  से फिर से ताजगी प्राप्त करते लेते  है |  धर्म कार्य पर तथा तीर्थ पर नंगे पाव चलने  का विधान है | साधु और तपस्वी  पृथ्वी की पोषक शक्ति  द्वारा  साधक  को लाभान्वित  करना ही है |



पक्के  मकानों में रहने वालों  की अपेक्षा  मिट्टी की झोपड़ियों  में रहने वाले  अधिक स्वस्थ  रहते है |  धरती माता के जितने ही  समीप रहते  है,  जितने ही उनके गोद में  खेलते  है | उतनी  ही वह  प्रेम  पूर्वक  हमे अपनी छाती  का रस पिलाती  है | उस रस को पीकर  जितनी स्वस्थता तथा निरोगता  प्राप्त होती है,  अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती |

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