योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा || Yoga and Naturopathy

योग सम्बन्धी अनेक विधाओ (लययोग , तपयोग , नादयोग , राजयोग आदि ) में राजयोग सर्व्स्रेठ एवं सर्वोपयोगी, सुगम प्रचलित विधा माना गया है | पतंजली योग को ही राजयोग कहा जाता है | इसके आठ अंग है | इसे  '  अष्टांगयोग '   भी कहा जाता है |



स्वस्थ्य शरीर के लिये -


आधुनिक विज्ञान की प्रगति स्तुत्य है | उसने हमें अनेकों अनुदान दिए है| चिकित्सा विज्ञान के छेत्र में निरोग बनाने एव आयुष्य बड़ाने सम्बन्धी जितने प्रयोग पिछले दो-तीन दसको में सारे विश्व में हुए है , उतने संभवतः गत पांच शताब्दीयों में भी नहीं हुए, फिर भी फिर भी क्या कारण है की मनुष्य अपनी जीवन शक्ती निरंतर खोता चला जा रहा है |


नित नए असाध्य रोगों का शिकार होता जा रहा है | जबकि निरोग जीवन मनुष्य की स्वभाविक प्राकृति है | मनुष्य के लिए ऋर्षियो का संदेश है | "जीवेम्र शरद: शतम्र " - व्यक्ति सो वर्षो तक सुखपूर्वक जीए | सो वर्ष से भी अधिक जीने वाले , स्वास्थ्य के मोलिक सिधान्तों को जीवन में उतारने वाले अनेकानेक व्यक्ति कभी वसुधा पर थे एव इसे एक सामान्य सी बात माना जाता था | तब सामान्य था जब मनुष्य प्राकृति के सन्निकट , प्रकृति के गोद में , प्रकृति के अजस्त्र अनुदानों का लाभ लेता था | पञ्च महाभूतो से निर्मित जीवन काया का प्रकृति के अनुशासन में सदुप्रयोग कर अलोकिक आनन्द से भरापूरा जीवन जीता था |



रोगों की उत्पति की जड़ हमारी जीवनशैली का त्रुटिपूर्ण होना है | हमारी जीवनीशक्ति - प्राण शक्ति व जीवन सेली स्वभाविक प्रकृति के अनुशासन में रहे तो हमे कभी रोग - शोक सता नहीं सकते | पंचभूतों से बनी इस काया को जिसे अंत में मिट्टी में ही मिल जाना है , क्या हम पंच भूतों , आकाश , वायु , जल , मिट्टी और अग्री के माध्यम से स्वस्थ बना सकते है उत्तम स्वास्थ्य बिना औषधि के बनाये रखने के लिए उनने चार सूत्र दिए है -


(1) खाद्य पदाथो का सही चुनाव ,

(2) सही खाने का तरीका ,

(3) समुचित परीश्रम तथा

(4) सही सुव्यवस्थित जीवनशैली |

6 views
  • Twitter
  • Facebook

©2020 by e-healthshiksha