सूर्य स्नान की विधि (sun bath benefits)

सूर्य स्नान के लिए प्रातःकाल का समय सब से अच्छा है | इससे दूसरे दर्जे का समय संध्याकाल है | इसके लिए हल्की किरणें ही उत्तम हैं तेज धूप में न बैठना चाहिए | health tips


सूर्य स्नान आरम्भ में आधा घंटा करना चाहिए , फिर धीरे - धीरे इसे बढ़ाकर एक डेढ़ घंटे तक ले जाना चाहिए |




लज्जा निवारण के लिए एक बहुत छोटा हल्का और ढीला वस्त्र कटी प्रदेश में रखकर अन्य समस्त शरीर को खुला रखना चाहिए |



सूर्य स्नान करते समय सिर को रुमाल या पत्ता से ढक लेना चाहिए | केला या कमल जैसा बड़ा और शीतल प्रकृति का पत्ता मिल जाय तो और भी अच्छा , अन्यथा नीम की पत्तियों का एक बड़ा सा गुच्छा लिया जा सकता है , जिससे सिर ढक जाय |


जितने देर सूर्य स्नान हो उतने समय के चार भाग करके –


i. पेट

ii. पीठ

iii. दांया करवट

iv. बाया करवट  इन चारों भागों को सूर्य के सामने रखना चाहिये , जिससे हर एक अंग को धूप लग जाय |


धूप सेवन करने के बाद ताजे पानी में भिगोकर निचोड़े  हुए मोटे तोलिये से शरीर के हर अंग को रगड़ना चाहिये , जिससे गर्मी के कारण रोम कूपों द्वारा भीतर से निकली हुई खराबी शरीर से ही चिपकी न रह जावे |


धूप सेवन खाली पेट करना चाहिए | कम से कम दो घंटे पहले और आधे घंटे बाद तक कुछ न खाना चाहिए |


सूर्य स्नान का स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ जोर के हवा के झोके न आते हो |



धूप सेवन के बाद स्वभावतः हल्का और फुर्तीला हो जाता है , परन्तु यदि ऐसा न हो तो सूर्य स्नान का समय कुछ कम कर देना चाहिए |


यदि स्थिति और ekSle (ऋतु ) अनुकूल हो तो सूर्य स्नान के बाद ताजे पानी से स्नान कर डालना चाहिए | जिस दिन बादल हो रहे हो या तेज हवा चल रही हो उस दिन सूर्य सेवन यानी स्नान नहीं करना चाहिए |


नियमित रूप से सूर्य स्नान करने से हर अवस्था के तथा हर रोग के स्त्री , पुरुष बालक – बालिका को लाभ पहुँचता है | सूर्य की किरणें शरीर में भीतर तक प्रवेश कर जाती है और रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करती है , पसीने द्वारा उन खराबियों को बाहर निकालती है और अपनी पोषक शक्ति से {kr – fo{kr  एवं निष्क्रिय रुग्ण अंगो को बल – प्रदान करती है | टूटी हुई हड्डी जुड़ने तथा घावों को भरने तक को धूप सेवन से बहुत लाभ होता देखा गया है |

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