स्वर योग से रोग निवारण | Yoga prevention

Updated: Jun 29


जैसे चूहे मरने पर संक्रमण रोग ( प्लेग ) के फ़ैलाने का भय होता है , उसी प्रकार जब बदन में अंगड़ाइयां आती है , तो बुखार की सूचना मिलती है | छिके आरम्भ होना जुकाम का नोटिस है | ऐसे लक्षणों के प्रकट होने पर रोग विशेष के आक्रमण की आशंका होती है | शारीरिक रोग इस बात के चिन्ह हैं कि शरीर में कहीं कुछ न्यूनता या दुर्बलता है अथवा भौतिक प्रकृति विरोधी के स्पर्श के लिए कहीं से खुली हुई है, तभी तो रोग बाहर से हमारे अन्दर आते हैं| जब यह आते हैं, तभी यदि कोई इनके आने का अनुभव कर सके और इनके शरीर में प्रवेश करने से पहले ही रोक सकने की शक्ति और अभ्यास उसमें हो जाये तो मनुष्य रोग-मुक्त रह सकता है| जब यह आक्रमण अन्दर से उठता हुआ दिखाई देता है, तो समझना चाहिए कि यह बाहर से आया हुआ रोग चेतना में प्रवेश करने से पहले पकड़ा नहीं जा सका| अच्छा होता, यदि हम रोग को प्रवेश पाने से पूर्व ही जान लेते और उसे पहले ही रोक देते| यह क्रिया स्वर-योग द्वारा सरलता तथा सफलतापूर्वक हो सकती है| समस्त रोग शरीर में सूक्ष्म चेतना और सूक्ष्म शरीर के ज्ञान तंतुमय या प्राण भौतिक कोप द्वारा प्रवेश करते हैं| जिसे भी सूक्ष्म शरीर का ज्ञान है अथवा सूक्ष्म चेतना से सचेतन है, वह रोगों को शरीर में प्रवेश होने से पूर्व ही मार्ग में से लौटा सकता है| हाँ, यह संभव हो सकता है की निद्रावस्था अथवा अचेतन अवस्था में कोई रोग आक्रमण कर दे, किन्तु फिर भी आतंरिक साधना द्वारा उसका निवारण हो सकता है| जब नियमित स्वान्सगति में विकृति पैदा होती है तो जानना चाहिए की शत्रु सेंध लगा रहे हैं| जो आक्रमण से पूर्व ही सावधान हो जाता है, वह रक्षा की तैयारी कर लेता है| इस प्रकार रोगों से बचने के बहुत अवसर उसे मिल जाते हैं|




जब स्वर में कुछ विकार पैदा होने लगे और नियमित समय अथवा गति में अंतर प्रतीत होने लगे तो सावधान हो जाना चाहिए और स्वरों को ठीक गति पर लाने का प्रयत्न करना चाहिए| स्वर बदलने के उपाय अन्यत्र लिखे जा चुके हैं, उनकी सहायता से स्वर की शुद्धि कर ली जाये तो रोगों को पूर्व में ही रोका जा सकता है| आहार-विहार की विशेष सावधानी रोग-निवारण में सहायक हो सकती है|


जब रोग आ ही जाये तो देखना चाहिए की उसका आरम्भ किस स्वर से हो रहा है? जिस स्वर में रोग की शुरुआत हुई हो, उसे बदल लीजिये और जब तक की बीमारी का प्रकोप बढ़ा हुआ रहे, उस स्वर को बदले रहिये| ऐसा करने से दस-बीस दिन में अच्छी होने वाली बीमारी आधे या चौथाई समय में ही अच्छी हो जाएगी|


बीमारी का वेग जिस समय अत्यंत प्रबल हो रहा हो और रोगी वेदना से छटपटा रहा हो तो उसका चलित स्वर बदलवा देना चाहिए, इससे उसको तुरंत ही शान्ति मिलेगी और बढ़ा हुआ कष्ट मिट जायेगा |





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