Gross use of spirituality | अध्यात्म का स्थूल प्रयोग

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली को हमने अध्यात्म ज्ञान के शारीरिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रयोग की दृष्टि से ही जाना और माना गया है और उसी मान्यता के आधार पर इसे अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं । इसका पहला आधार शरीर शुद्धी का ही एक स्थूल रूप है। इस प्रणाली के अनुसार चिकित्सा कराने वाले के लिए आत्म संयम का अपनाना, इन्द्रियों पर काबू रखना , मन को मारना नितान्त आवश्यक है। इसके बिना यह चिकित्सा प्रणाली एक कदम भी आगे नहीं बढ़ती । उपवास को प्राकृतिक चिकित्सा का प्राण कहा जाता है। आहार में ऋषि मुनियों जैसी सात्विकता अपनानी पड़ती है।

शाक, फल, छांछ और दूध को बिना मसाले और बिना शक्कर के लेना जिह्वा इन्द्रिय की एक कड़ी तितीक्षा और तपश्चर्या है। आज जबकि हर आदमी चटोरेपन की आदतों से बुरी तरह ग्रसित है, उपवास के नाम पर लोग जो माहौल बनाते हैं उसमें भी हलुवा, मिठाई, मैदा , नमक , कालीमिर्च आदि का पूरा सरंजाम ऐसा इकठ्ठा कर लेते है जिसमें चटोरेपन को पूरी छूट रहती है। इसके मुकाबले में प्राकृतिक चिकित्सा का रोगी कहीं अधिक कठोर उपवास करता है ।


उसे मिठाई मसाले सभी कुछ छोड़ने पड़ते हैं। आरम्भ में निराहार उपवास करने पड़ते हैं और पीछे बहुत दिनों तक शाक, फल, छांछ जैसे परम सात्विक आहार को बहुत स्वल्प मात्रा में लेकर काम चलाना पड़ता है। ठूँस - ठूँस कर चटपटे पदार्थ खाते रहने वाले जिह्वालोलुप व्यक्तियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही कठिन है जितना दुष्ट दुराचारियों के लिए भगवान में एक क्षण के लिए भी मन लगा सकना ।

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