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Updated: Aug 18

स्वथ्य मनुष्य को अपनी तंदुरुस्ती कायम रखने और उसे बड़ाने के लिए नित्य गायत्री मंत्र के साथ हवन करना चाहिए | इससे आध्यात्मिक लाभ भी होता है | रोगी मनुष्य यदि चल फिर सकता हो तो उसे आसन पर पूर्व की ओर मुँह करके बैठना चाहिए और स्वयं हवन करना चाहिए | यदि रोगी अशक्त हो तो उसे हवन के समीप मुलायम बिस्तर पर लिटा देना चाहिए | जिस कमरे में रोगी को रहना होता हो उस कमरे की खिडकियों को खोलकर यदि हवन किया जाय तो बहुत अच्छा है | परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कमरे में जरूरत से ज्यादा गैस भर जाने के कारण रोगी को कष्ट न हो | हवन की अग्री प्रज्जवलित रहनी चाहिए | धुंआ सदा हानिकारक होता है , चाहे वह लकड़ी का हो चाहे हवन सामग्री का हो | जलती हुई अग्री से ही ओषधियों की सूक्ष्मता ठीक प्रकार होती है | घर में हवन की वायु के बस जाने से अनेक प्रकार के अस्वास्थ्यकर विकारों का निवारण हो जाता है |

हवन के समय हल्के ढीले और कम वस्त्र पहनने चाहिए | यदि ऋतु अनुकूल हो तो कम कपड़े पहन कर ही बैठना चाहिए | जिससे की यज्ञ की वायु शरीर को बाहर भी स्पर्श करे | स्नान करके बैठना सबसे अच्छा है ; पर यदि स्थिति अनुकूल न हो तो हाथ मुँह धोकर भी काम चल सकता है | यदि विधिवत् हवन न हो सके तो एक मिट्टी के सकोरे में लकड़ियाँ जलाकर उस पर घी और हवन सामग्री डालकर रोगी के समीप रख देना चाहिए | एक तरीका यह भी हो सकता है की सामग्री को कूट कर घी के साथ उसकी बत्ती सी बना ली जाय और धूपबत्ती की तरह उसे जलने दिया जाय | हवन के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा होता है | बिना विशेष आवश्यकता के रात्रि में हवन न करना चाहिए |





हवन के समीप जल का भरा हुआ एक पात्र रखना कभी न भूलना चाहिए | यदि बड़ा हवन हो तो हवन कुण्ड के चारों ओर पानी के भरे पात्र रख देने चाहिए , कारण यह है कि हवन में जहाँ उपयोगी वायु निकलती है, वहाँ कार्बन डाइऑक्साइड सरीखी हानिकारक गैस भी निकलती है | पानी उस हानिकारक गैस को खींचकर अपने में चूस लेता है | इस पानी को सूर्य के सम्मुख अर्घ्य के रूप में फैला देने का विधान है | इस जल को पीने आदि के काम में न लाना चाहिए |

हवन के अतिरिक्त वायु चिकित्सा का दूसरा तरीका प्राणायाम है | हम अपनी " आसन और प्राणायाम " एवं आसन प्राणायाम से आधि - व्याधि निवारण " होते है | प्राणायाम के द्वारा अनेक कठिन रोग के रोगी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर चुके है |

खुली हवा में प्रातः काल मेरुदण्ड सिधाकर पद्मासन से समतल भूमि पर एक छोटा आसन बिछाकर बैठें , फेफड़ों में जितनी हवा भरी हो उस सबको धीरे – धीरे बाहर निकाल दें , जब फेफड़े बिल्कुल खाली हो जाय तो धीरे – धीरे साँस खिचना आरम्भ करें और जितनी वायु छाती एवं पेट में भरी जा सके भर लें , जितने सेकंड में हवा खिंची गई हो उसके एक तिहाई समय तक वायु को भीतर ही रोकें , अब धीरे - धीरे वायु को बाहर निकालना आरम्भ करें और पेट को बिल्कुल खाली कर दें , जितनी देर में हवा बाहर निकाली गई हो उसके एक तिहाई समय तक बिना वायु के रहें , फिर पूर्ववत् वायु खींचना आरम्भ कर दें यह एक प्राणायाम हुआ | ऐसा प्राणायाम सामर्थ्य के अनुसार एक समय में १० – १५ या न्यूनाधिक किये जा सकते है |

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