मिट्टी में अमृत मिला है ( mitti )


( क्षिति जल पावक गगन समीरा | पंच रचित यह अधम शरीरा || )


पृथ्वी , जल , अग्री , वायु और आकाश ये पांच तत्व हैं , जिनसे शरीर  बनता है | इन  पाँचों तत्वों में से जो ज्यादा स्थूल है वह पृथ्वी तत्व है | इसमें शेष चारों तत्व उपस्थित हैं |


कोई भी प्राणी तब तक स्वस्थ रहता है जब तक पाँचों तत्व अपने – अपने अनुपात से मोजूद रहते है , जब किसी में कमी – पेशी होती है तो प्राणी में विकार आ जाते हैं , यह विकार ही रोग है |

यों तो बीमारी के कारण मानसिक भी होते हैं , लेकिन मानसिक रोग को भी प्राकृतिक उपचार ठीक कर देता है | प्राकृतिक उपचार में पृथ्वी , जल , अग्री  , वायु इन चार तत्वों का उपयोग किया जाता है | यों अन्न और ओषधियाँ भी इन तत्वों से ही भरी पड़ी हैं |


प्राकृतिक उपचार में खान – पान के संयम और पथ्य की आवश्यकता तो होती ही है , पर बाहरी उपचार भी आवश्यक होता है | बाहरी उपचार अंदर के विकारों को निकालता है और खान – पान , आहार – विहार भीतर के विकार को बढ़ने से रोकता है | उपचार की सबसे बड़ी विशेषता यही होनी चाहिए | यदि बाहर बीमारी निकलती रहे और भीतर बीमारी बढती रहे तो इस प्रकार स्वस्थ होना कठिन है | उसी प्रकार भीतर बीमारी अच्छी होती जाय पर विकार नष्ट न हों और जो बीमारी हो वह दूर भी हो जाय | इसीलिए बाहरी उपचार और खान – पान , आचार – विचार इन दोनों पर ही स्वास्थ्य निर्भर रहता है |


तत्वों के उपचार में पृथ्वी तत्व का उपचार जहाँ आसान है , वहाँ वह निरापद भी है | मिट्टी की चिकित्सा से हानि होती ही नहीं और छोटे से छोटे बच्चे से लेकर वृद्ध से वृद्ध व्यक्ति तक की चिकित्सा आसानी से की जा सकती है | ऐसा कोई रोग नहीं जिस पर मिट्टी का उपयोग न किया जा सके , फिर वह चाहे कैसा ही असाध्य क्यों न हो |  मरणासन्न रोगी भी इसके उपचार से अच्छे होते देखे गये हैं |


मिट्टी के उपचार में अधिकतर चिकनी मिट्टी का उपयोग किया जाता है | साथ ही वह मिट्टी साफ जगह की होनी चाहिए  और शुद्ध , यों अशुद्ध मिट्टी और विशेष हानि तो नहीं पहुँचाती पर देर लगा देती है इसलिए जहाँ तक साफ और गंदगी से रहित मिट्टी मिल सके वहाँ तक अन्य किसी प्रकार की मिट्टी का प्रयोग नहीं करना चाहिए |

कुछ लोग अपनी सुंदर , सुकोमल त्वचा पर मिट्टी लगाना असभ्यता का चिन्ह समझते हैं | फैशनेबल  लोग इसे हँसी की बात समझते हैं | पर उनको समझ लेना चाहिए कि जिस मिट्टी से हमारा शरीर बना है और जिस मिट्टी में हम पैदा हुए है भोजन नित्यप्रति खाकर हम जीवित रहते हैं , उसका किसी दशा में लज्जा संकोच का विषय नहीं माना जा सकता है | हमको उनका प्रयोग करके अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए |

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